इन दिनों अगर आप जापान के अख़बारों, फ़ैशन पत्रिकाओं या टीवी के विज्ञापनों पर नज़र दौड़ाएं, तो आप को एक नया 'सुपरहीरो' देखने को मिलेगा.
ये सुपरहीरो मुस्कुराते हुए हैंडसम लोग हैं, जो नाश्ते पर तलवारबाज़ी का खेल खेलते हैं. अपने बच्चों के साथ पार्क में साइकिल चलाते हैं. कई बार तो पापा अपने बच्चों जैसे लिबास में भी नज़र आते हैं. वो हमदर्द हैं. समझदार हैं. जापान के ये नए सुपरहीरो बड़ी ख़ुशी-ख़ुशी खाना पकाते हैं और घर के दूसरे काम करते हैं.
इन्हें जापान में 'इकुमेन' कहा जाता है. इकुमेन दो शब्दों को जोड़ कर बनाया गया है. इकुजी यानी बच्चों की देख-भाल और इकेमेन यानी बलवान. ये इकुमेन पिता, पहले के दौर के कामकाजी जापानी मर्दों की छवि के ठीक उलट हैं.
पहले के पिता जहां काम के जुनून से भरे होते थे. वहीं आज इकुमेन पापा बनने की होड़ जापान के मर्दों में लगी है. ये शब्द सबसे पहले 2000 के दशक में एक विज्ञापन लिखने वाले ने गढ़ा था.
2010 में जापान के स्वास्थ्य, श्रम और कल्याण मंत्री ने राष्ट्रव्यापी इकुमेन प्रोजेक्ट शुरू किया. इसका मक़सद मर्दों में पारिवारिक जीवन के प्रति ज़्यादा लगाव पैदा करना था.
जल्द ही इकुमेन का विचार बहुत लोकप्रिय हो गया. आज जापान की लोक संस्कृति में ये बहुत चलन में आ गया है.
लेकिन, क्या इस शब्द की वजह से जापान के समाज में औरतों और मर्दों के बीच भेदभाव कम हुआ है?
या फिर, चटख, शोख़ और चमकीली तस्वीरों ने केवल ऊपरी तौर पर आए बदलाव को दिखाना शुरू किया है. जबकि हक़ीक़त में आज भी परिवार की ज़्यादा ज़िम्मेदारी महिलाएं ही उठा रही हैं?
पहले के ज़माने में जापान में मर्दों का काम केवल घर के लिए पैसे कमाना समझा जाता था. ये तनख़्वाह वाले लोग अपनी कंपनी के प्रति समर्पित होते थे. देर तक दफ़्तर में रुक कर काम करते थे, ताकि परिवार को आर्थिक सुरक्षा मिल सके और वो तरक़्क़ी की सीढ़ियां तेज़ी से चढ़ सकें.
हाल ही में जापान के समाज पर किताब, 'कूल जैपेनीज़ मेन' लिखने वाली हैना वसालो कहती हैं, 'काम के प्रति निष्ठा दिखाने वालों को ही जापान के समाज में आदर्श मर्द माना जाता था.'
वैसे, ऐसी सोच केवल जापान के समाज में नहीं पायी जाती. लेकिन, 1980 के दशक में भी जापान के पुरुष अपने बच्चों के साथ रोज़ औसतन चालीस मिनट से भी कम बातें किया करते थे. और ये बात भी आम तौर पर रात के खाने की टेबल पर हुआ करती थी.
एक रिसर्च के मुताबिक़ कई जापानी पुरुष तो चाय तक नहीं बना पाते थे. यहां तक कि वो बिना पत्नी की मदद के अपने कपड़े तक नहीं तलाश पाते थे. जब, पिता अपने बच्चों से बात भी करते थे, तो वो लगाव वाली नहीं हुआ करती थी. अक्सर वो आदेश देने वाली बातें हुआ करती थीं, ताकि बच्चे पिता का सम्मान करें और डरें.
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