Sunday, February 3, 2019

जब प्रदूषण छुपकर करता है आपके पेट पर 'वार'

हमारे पेट में बसने वाले तमाम जीवाणु, कीटाणु और प्रोटोज़ोआ का हमारी सेहत से गहरा ताल्लुक़ है. अरबों-खरबों की तादाद में रहने वाले इन छोटे जीवों का हमारे शरीर के अंगों की सेहत पर अच्छा और बुरा दोनों तरह का असर पड़ता है.

इन्हें अंग्रेज़ी में माइक्रोबायोम कहते हैं. पेट में पाए जाने वाले इन जीवों में से कौन अच्छे हैं और कौन बुरे, ये साफ़ नहीं है. लेकिन, वैज्ञानिक ये मानते हैं कि हमारे आस-पास की आबोहवा का असर इन पर पड़ता है. वायु प्रदूषण इनमें से एक है.

आज जबकि दुनिया भर में शहरों में प्रदूषण बढ़ रहा है, तो ज़ाहिर है कि इसका असर हमारे शरीर में पलने वाले इन जीवों पर भी पड़ रहा है. लेकिन, प्रदूषण के बुरे असर से प्रभावित माइक्रोबायोम हमारी सेहत पर कितना गहरा असर डालते हैं, इसकी पड़ताल की जा रही है.

डेनमार्क की कोपेनहेगेने यूनिवर्सिटी की वैज्ञानिक मैरी पेडरसन कहती हैं कि हमारी सेहत की बुनियाद बचपन में ही पड़ जाती है. लेकिन, हमारे पेट की सेहत का असर आगे चल कर हमारे रहन-सहन पर निर्भर करता है. हम जिस परिवेश में रहते हैं, उससे इन माइक्रोबायोम पर अच्छा या बुरा असर पड़ सकता है.

ख़राब असर की सूरत में हमारी आंतों में कई ऐसी बीमारियां जन्म ले लेती हैं, जिनका इलाज ही मुमकिन नहीं है. जैसे कि पेट में जलन. ये आंतों में अल्सर या फिर क्रोन्स नाम की बीमारी का नतीजा होता है.

ये ऐसी बीमारियां हैं, जो ताउम्र परेशान करती हैं. ये बीमारियां तब होती हैं जब हमारी रोगों से लड़ने की व्यवस्था नाकाम हो जाती है. या फिर शरीर ख़ुद को नुक़सान पहुंचाने लगता है.

ब्रिटेन की सेहत एक्सपर्ट जैना शाह कहती हैं कि एक ऐसे घाव की कल्पना कीजिए जो कभी भरता ही नहीं है. और ऐसा घाव आपके शरीर के भीतर होता है.

आंतों का अल्सर अक्सर बड़ी आंत में होता है. लेकिन क्रोन्स नाम की बीमारी पेट में कहीं भी हो सकती है. इसका असर हारमोन, पाचन क्षमता और शरीर की ऊर्जा पर भी पड़ता है. यही नहीं ये हमारी ज़हनी सेहत पर भी प्रभाव डालती है. जैना शाह कहती हैं कि क्रोन्स बीमारी का इलाज जीवन भर चलता रहता है. कई बार तो इससे निजात पाने के लिए सर्जरी तक करानी पड़ती है.

जैना शाह बताती हैं कि, 'क्रोन्स और आंतों का अल्सर हमें अपने मां-बाप के जीन से मिलता है. इन बीमारियों को बढ़ाने में हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता की नाकामी भी ज़िम्मेदार होती है. शायद इसकी वजह पर्यावरण में आया बदलाव भी होता है.'

रिसर्च कहती हैं कि पर्यावरण में बदलाव से हमारे खान-पान पर असर पड़ता है. तनाव बढ़ जाता है. जब हम बहुत बंद माहौल में रहते हैं, तो हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की ताक़त ठीक से विकसित नहीं हो पाती.

कनाडा की कालगरी यूनिवर्सिटी के गिलाद काप्लान कहते हैं कि जीन के अलावा पर्यावरण के फैक्टर हमारे पेट में आबाद माइक्रोबायोम पर असर डालते हैं.

पेट में जलन के लिए हमारे 200 से ज़्यादा जीन ज़िम्मेदार हो सकते हैं. ये हमारी आंतों की दीवारों के गठन के लिए ज़िम्मेदार होते हैं. इनका ताल्लुक़ हमारी रोगों से लड़ने की ताक़त से भी होता है. क्योंकि आंतों की दीवारें बैक्टीरिया से मुक़ाबला करती हैं.

पेट की जलन पर रिसर्च करने वाले अब पर्यावरण प्रदूषण से इसका ताल्लुक़ तलाशने में जुटे हैं. क्योंकि ये पाया गया है कि पेट की ये बीमारी अक्सर शहरी लोगों को ज़्यादा होती है. ज़्यादा विकसित देशों के नागरिकों में ये बीमारी और भी ज़्यादा होती देखी गई है.

यूरोप और उत्तरी अमरीका के शहरों में रहने वाले ज़्यादा लोगों को पेट में जलन की बीमारी परेशान करती है. वहीं अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमरीका के तेज़ी से विकसित हो रहे देशों में ये मर्ज़ तेज़ी से बढ़ रहा है.

माना जाता है कि वायु प्रदूषण का असर पेट के जीवाणुओं पर होता है. गिलाद काप्लान ने इस बारे में ब्रिटेन में 900 लोगों पर रिसर्च की.

तीन साल तक चले तजुर्बे के बाद उन्होंने पाया कि जिन युवाओं का सामना नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड से ज़्यादा होता है, उनमें क्रोन्स बीमारी ज़्यादा होती है. वायु प्रदूषण का ताल्लुक़ अपेंडिसाइटिस और पेट के दर्द से भी पाया गया है.

इस रिसर्च में कमी ये है कि इसमें शामिल लोग लंबे वक़्त तक प्रदूषण के शिकार नहीं रहे हैं. ये भी साफ नहीं है कि वायु प्रदूषण से ही ये बीमारियां पैदा हुईं.

वायु प्रदूषण के लिए कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और धूल, परागण, धुआं वगैरह ज़िम्मेदार होते हैं. ऐसे प्रदूषण से न सिर्फ़ बीमारियां हो रही हैं, बल्कि लोगों की मौत भी हो रही है.

लोगों को वायु प्रदूषण की वजह से फेफड़ों की बीमारी हो रही है, दिल के दौरे पड़ रहे हैं और डायबिटीज़, अस्थमा व अल्झाइमर जैसे मर्ज़ हो रहे हैं.

लेकिन, वैज्ञानिकों को अभी ये नहीं मालूम कि इन बीमारियों के लिए कौन से तत्व ज़िम्मेदार हैं.

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