अगर आप का रिश्ता मुश्किल में होता है, तो आप उसे बचाने के लिए पुरज़ोर कोशिश करते हैं. आपस में बात करते हैं. मनोवैज्ञानिकों और रिश्तों के एक्सपर्ट से मशविरा करते हैं.
लेकिन, इन कोशिशों के दौरान आप के ज़ेहन में ये सवाल उठता है कि आख़िर, इन कोशिशों का नतीजा क्या होगा? कामयाबी मिलेगी या नहीं? रिश्ता बचेगा या नहीं?
इन सवालों के जवाब के लिए आपको कुछ देर ठहरना होगा और सुनना होगा. जब आपके पार्टनर बोल रहे हों, तो आपको उनकी आवाज़ को गंभीरता से सुनना होगा.
जब लोग बोलते हैं, तो उनकी आवाज़ के उतार-चढ़ाव से हमें उनके मनोभाव की झलक मिल जाती है.
आवाज़ के बीच ठहराव से लेकर जितनी तेज़ या धीमी आवाज़ में बोला जाता है, ये सभी इंसानों के ज़हन में चल रहे ख़यालात का संकेत देता है. किसी के एहसास को गुपचुप तरीक़े से बता जाता है.
इनमें से बहुत से संकेतों को तो हम बस अपनी छठी इंद्री की मदद से समझ जाते हैं. इन संकेतों की मदद से हम अपने शब्दों का हिसाब-किताब लगाते हैं, फिर बोलते हैं.
हम अनजाने में अपनी बातों से अपनी सोच का एहसास करा देते हैं. पर, बात यहीं तक सीमित नहीं है.
लोगों के बोलने से और भी छुपी हुई जानकारियां निकाली जा सकती हैं. वैज्ञानिकों ने ऐसी मशीनें बना ली हैं, जो आवाज़ में छुपे हुए राज़ का पता लगा सकती हैं. इनकी मदद से लोगों को बता सकती हैं कि उनका रिश्ता बचेगा या नहीं.
कई मामलों में तो ये आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, तजुर्बेकार विशेषज्ञों पर भारी पड़ते हैं.
एक रिसर्च में वैज्ञानिकों ने 134 ऐसे जोड़ों को शामिल किया, जिनके रिश्ते मुश्किल दौर से गुज़र रहे थे.
अगले दो साल तक इन जोड़ों ने आपस में बातचीत का 10 मिनट का ऑडियो रिकॉर्ड किया. हर साथी ने एक विषय चुनकर उस पर अपनी राय रखी.
साथी को बताया कि वो क्यों बहुत अहम है. दो साल के इस तजुर्बे के बाद इन जोड़ों के रिश्ते बने या बिगड़े, वैज्ञानिकों के पास इसका भी हिसाब था.
इन जोड़ों की बीच बातचीत को विशेषज्ञों ने देखा. उन्होंने जोड़ों के बीच बातचीत, उनके हाव-भाव और शब्दों को बयां करने के अंदाज़ से पता लगाया कि उनका रिश्ता बच जाएगा या ख़त्म हो जाएगा.
इसी रिसर्च के दौरान आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) को भी इन जोड़ों की बातचीत में छुपे राज़ निकालने की ट्रेनिंग दी गई. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को इस बात की ट्रेनिंग दी गई थी कि वो लोगों के बोलने के अंदाज़, आवाज़ के वजन आदि से ये पता लगाए कि आख़िर रिश्ता चलेगा या नहीं.
ये मशीनें केवल आवाज़ की रिकॉर्डिंग के आधार पर किसी नतीजे पर पहुंचने वाले थे. इनके डेटा स्टोर में वीडियो वाली जानकारी नहीं डाली गई थी.
साथ ही इन मशीनों को जोड़ों के बीच बातचीत के मुद्दों से भी दूर ही रखा गया था. मशीनों को केवल, जोड़ों के बातचीत के अंदाज़, आवाज़ की रफ़्तार वगैरह की मदद से ये पता लगाना था कि रिश्ता टिकेगा या नहीं.
मज़े की बात ये है कि इन आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से लैस मशीनों ने लोगों की बातचीत से कई ऐसी जानकारियां निकाल लीं, जो हम इंसान समझ नहीं सकते.
अमरीका की सदर्न कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के श्री नारायणन कहते हैं कि ढेर सारे आंकड़ों की मदद से इन मशीनों ने वो बातें गौर कर लीं, जो हमारी आंखों को नज़र नहीं आईं.
जोड़ों के बीच बातचीत की ट्रेनिंग दिए जाने के बाद ये आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाली मशीनें, रिश्तों के बारे में भविष्यवाणी करने के मामले में विशेषज्ञों से भी आगे निकल गईं. उनकी कामयाबी का प्रतिशत 79.3 था, जबकि असल एक्सपर्ट के रिश्तों को लेकर पूर्वानुमान 75.6 फीसद ही सही रहे.
श्री नारायणन कहते हैं कि हमारा दिमाग़ बहुत सारी जानकारियों को एक साथ ग्रहण कर सकता है लेकिन हम सभी जानकारियों की समीक्षा तो नहीं कर सकते.
मगर इस रिसर्च से एक बात साफ है. जब हम किसी से बात करते हैं, तो हम ऐसे कई संकेत देते हैं, जिससे हमारे ज़हन का अंदाज़ा हो जाता है. हमारी बातचीत में कई ऐसी चीज़ें छुपी हैं, जिनका पता सामने वाले को ही होता है. और इन्हें समझने का काम आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से लैस मशीनें बेहतर ढंग से कर सकती हैं.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के जानकार फियोला हेल्गाडोटिर का कहना है कि कंप्यूटर बड़े ढेर सारे आंकड़ों में से एक पैटर्न निकाल सकता है. वहीं, इंसान इसके पीछे की सोच के बारे में बता सकता है.
कई अक़्लमंद मशीनें, ढेर सारे आंकड़ों से नए संकेत निकाल लाती हैं. और ये संकेत तीन चौथाई तक सही होते हैं. ऐसे पूर्वानुमान से आपको ये अंदाज़ा होता है कि रिश्ता कितना टिकाऊ है.
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