कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की चुनावी जनसभा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर इस दावे के साथ शेयर किया जा रहा है कि उन्होंने किसानों को चाँद पर खेती के लिए ज़मीन देने का वादा किया है.
25 सेकेंड के इस वायरल वीडियो में राहुल गांधी को यह कहते सुना जा सकता है, "यहाँ पर तुम्हारे खेत से पैसे नहीं बन रहे हैं, वो देखो चाँद है. उस पर मैं तुम्हें खेत दूंगा. आने वाले समय में वहाँ तुम आलू उगाओगे."
'टीम मोदी 2019' और 'नमो अगेन' जैसे दक्षिणपंथी रुझान वाले कुछ बड़े फ़ेसबुक ग्रुप्स में यह वीडियो पोस्ट किया गया है जिसे अब तक 60 हज़ार से ज़्यादा बार देखा जा चुका है.
वीडियो के साथ संदेश लिखा है, "कांग्रेस अध्यक्ष को कोई रोके. वो अब किसानों को चाँद पर खेती की ज़मीन देने का वादा कर रहे हैं."
इसी संदेश के साथ ट्विटर और शेयर चैट के साथ-साथ वॉट्सऐप पर भी इस वीडियो को सर्कुलेट किया जा रहा है.
वीडियो की पड़ताल में हमने पाया कि राहुल गांधी की आवाज़ से तो कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है, लेकिन उनके बयान का सिर्फ़ एक हिस्सा इस वीडियो में है.
साथ ही इस वीडियो को 2019 के लोकसभा चुनाव से जोड़कर इसे ग़लत संदर्भ दे दिया गया है.
असली वीडियो
24 सेकेंड का यह वायरल वीडियो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के गुजरात में दिए क़रीब आधे घंटे लंबे भाषण का हिस्सा है.
11 नवंबर 2017 को शुरू हुई कांग्रेस पार्टी की 'नवसृजन यात्रा' के दौरान गुजरात के पाटन शहर में राहुल गांधी ने यह भाषण दिया था.
दिसंबर 2017 में हुए गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी ने गुजरात में 'नवसृजन यात्रा' की थी.
इस यात्रा में सूबे के चुनाव प्रभारी रहे अशोक गहलोत और पार्टी नेता अल्पेश ठाकोर उनके साथ थे.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने भाषण में कहा था, "उत्तर प्रदेश के भट्टा-परसौल में हम किसानों के लिए अड़े रहे. मैं एक क़दम पीछे नहीं हटा. मैं झूठे वायदे नहीं करता हूँ. कभी-कभी आपको ये अच्छा नहीं लगता है. मोदी जी कहते हैं, देखो यहाँ पर तुम्हारे खेत से पैसे नहीं बन रहे हैं, वो देखो चाँद है. उस पर मैं तुम्हें खेत दूंगा. आने वाले समय में वहाँ तुम आलू उगाओगे. वहाँ मैं मशीन लगाऊंगा. और फिर हम आलू को गुजरात लाएंगे. इससे मैं मुक़ाबला नहीं कर सकता हूँ. मैं सच्चाई बोलता हूँ. सच क्या है और झूठ क्या है, वो अब आपको साफ़ दिख रहा है."
राहुल गांधी ने गुजरात की इस जनसभा में पीएम नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए ये बातें कही थीं.
राहुल गांधी के इस भाषण को उनके आधिकारिक यू-ट्यूब पेज पर सुना जा सकता है जो कि 12 नवंबर 2017 को पोस्ट किया गया था.
राहुल गांधी की इसी रैली का एक और बयान साल 2017-18 में सोशल मीडिया पर काफ़ी वायरल रह चुका है.
राहुल गांधी के भाषण से छेड़छाड़ के बाद ये दावा किया गया था कि उन्होंने 'आलू से सोना बनाने वाली किसी मशीन' की बात की है.
इस भ्रामक बयान को लेकर उनका काफ़ी मज़ाक़ बनाया गया. सोशल मीडिया पर उनके लिए जोक बने.
लेकिन ये भी उनका अधूरा बयान था.
राहुल ने कहा था, "आदिवासियों को कहा कि 40 हज़ार करोड़ रुपये दूंगा. एक रुपया नहीं दिया. कुछ समय पहले यहाँ बाढ़ आई तो कहा 500 करोड़ रुपये दूंगा. एक रुपया नहीं दिया. आलू के किसानों को कहा कि ऐसी मशीन लगाऊंगा कि एक साइड से आलू डालो तो दूसरी साइड से सोना निकलेगा. लोगों को इतना पैसा मिलेगा कि पता नहीं होगा कि पैसे का करना क्या है. ये मेरे शब्द नहीं हैं, नरेंद्र मोदी के शब्द हैं."
'किसानों को चाँद पर ज़मीन देने की बात' और 'आलू से सोना बनाने की बात' राहुल गांधी ने गुजरात की रैली में पीएम नरेंद्र मोदी के हवाले से कही थी.
लेकिन इंटरनेट सर्च में ऐसी कोई ख़बर, वीडियो या कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं मिलता जिसके आधार पर ये कहा जा सके कि नरेंद्र मोदी ने अपनी जनसभा में कभी इस तरह के दावे किये थे या नहीं.
Friday, April 19, 2019
Monday, April 15, 2019
सांसद का बेटा दुकानदार, मुख्यमंत्री के परिजन मजदूर और ये बिलकुल सच है: लोकसभा चुनाव 2019
रोजाना सुबह 72 साल के देवनाथ सेन ऑटो से पूर्णिया बस स्टैंड के पास मौजूद विकास बाजार जाते है और अपनी दुकान खोलकर दुकानदारी शुरू कर देते है. ये उनका रोजाना का काम है.
देखने में ये बात बहुत सामान्य-सी लगती है लेकिन दुकानदार देवनाथ सेन कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं. वो चार बार सांसद रहे फनी गोपाल सेन गुप्ता के बेटे हैं.
फनी गोपाल सेनगुप्ता 1952 से 1967 के बीच पूर्णिया लोकसभा क्षेत्र के लिए हुए चार आम चुनावों में जीत कर सांसद बने थे.
देवनाथ सेन बताते है, "पिताजी से जब कभी संपत्ति के बारे में बात की तो वो कहते थे - तुम खुद कमा के बना लेना, बहुत आनंद आएगा. यही सोचना कि तुम्हारे बाप ने तुम्हारे लिए कुछ नहीं किया. तब से ये बात दिलोदिमाग में बैठ गई कि ईमानदारी की रोटी खाएगें. "
फनी गोपाल सेनगुप्ता का खानदानी पेशा कविराज यानी वैद्द का था. ललित मोहन सेन गुप्ता का ये परिवार बांग्लादेश से 1890 में पूर्णिया आकर बस गया था.
ललित मोहन के तीन बेटे थे. सबसे बड़ा बेटा शिक्षक, फिर फनी गोपाल सेनगुप्ता और सबसे छोटा बेटा कविराज यानी वैद्द. चूंकि सबसे छोटे बेटे की मृत्यु कम उम्र में ही हो गई, इसलिए खानदानी पेशे को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं था.
पूर्णिया जिले की स्थापना के 250 साल पूरे होने पर प्रशासन द्वारा छापी पत्रिका 'वल्लरी' के मुताबिक़ फनी गोपाल सेनगुप्ता का जन्म 1905 में पूर्णिया शहर में हुआ.
मुख्य तौर पर ड्राइ फ्रूट की दुकान चला रहे देववाथ बताते है, "1929 में वो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में जुड़े जिसके बाद वो 1929, 1932, 1940, 1944 में जेल गए. 1933 में उनकी शादी हो गई लेकिन वो ज्यादातर जेल में रहते थे. तो मेरी नानी कहती थी कि मैने अपनी बेटी के गले में कलसी बांध कर पानी में डुबो दिया है."
पूर्णिया और भागलपुर से अपनी पढाई करने वाले फनी गोपाल सेनगुप्ता को बांग्ला, हिन्दी, उर्दु, अंग्रेजी भाषा पर अधिकार था.
परिवार के पास फनी गोपाल के जो कागज़ात हैं उनमें अंग्रेजी दैनिक अखबार 'द सर्चलाइट' का भी एक पत्र है. इस पत्र में संपादक सुभाष चन्द्र सरकार ने फनी गोपाल सेनगुप्ता को टैगोर की कविताओं के हिन्दी अनुवाद के लिए धन्यवाद दिया है.
पत्र में लिखा है कि ये कविताएं संपादक प्रदीप के संपादक को भेज रहे है.
परिवार के पास मौजूद दस्तावेज़ों में फनी गोपाल सेनगुप्ता की डायरी है जिसमें वो रोजाना की गतिविधियां बेहद महीन अक्षरों में अंग्रेजी में लिखते थे. इसके अलावा पार्लियामेंट लिखे नोटपैड के पन्ने है जिसमें उनका संसद सत्र के दौरान हुआ खर्च लिखा है.
देवनाथ सेन बताते है, "उस वक्त जब सत्र चलता था तब 40 रूपये रोज़ाना मिलता था. सासंद लॉज में रहते थे और दिल्ली आना-जाना भी अपने पैसे पर करना पड़ता था."
"पिताजी थर्ड क्लास में सफर करते थे और यहां क्षेत्र में साइकिल से ही घूमते थे. क्योंकि पैसे थे नहीं."
खुद देवनाथ सेन की पढ़ाई आर्थिक तंगी के चलते छूट गई.
देनवाथ सेन बताते है, "हम 3 भाई और 2 बहन थे. पिताजी सांसद थे लेकिन परिवार में बहुत आर्थिक तंगी थी. मैने पूर्णिया कालेज में दाखिला लिया था लेकिन बीए नहीं कर पाया और 1971 में मैंने ये दुकान खोल ली. हालांकि बहन शतोदल और मृदुला सेन में से छोटी बहन मृदुला को पोस्ट ग्रेजुएशन कराया."
देवनाथ कहते है, "हमारे पिता ने जीवन बहुत ईमानदारी से जिया. वो चार बार सांसद रहे लेकिन हम लोगों को कभी दिल्ली नहीं ले कर गए. बस एक बार पूरा परिवार दिल्ली घूमने गया था."
मुख्यमंत्री के पोते कर रहे हैं मज़दूरी
पूर्णिया शहर में स्थित इस दुकान से कुछ दूर ही मजदूरों की मंडी लगती है. काम के इंतजार में खड़े मजदूरों में बसंत और कपिल पासवान भी है.
ये दोनों ही बिहार के तीन बार और पहले दलित मुख्यमंत्री रहे भोला पासवान शास्त्री के पोते है.
रोजाना पूर्णिया के केनगर प्रखंड के बैरगाछी से ये लोग काम की तलाश में 14 किलोमीटर का फासला तय करके आते हैं. मजदूरी करते हैं और लौट जाते हैं. भोला पासवान की कोई संतान नहीं थी, उनकी जिंदगी के सहारे उनके भाइयों के बच्चे ही रहे.
वो कहते थे, "मेरी और मेरे बच्चों की पूरी जिंदगी मजदूरी करते हुए कट गई. बहुत मुश्किल से राशन कार्ड मिला है. लेकिन ये भी एक ही है जबकि बेटे तीन है. हमको तीन राशन कार्ड दिलवा दीजिए. जिंदगी थोड़ी आसान हो जाएगी."
परिवार के पास अपनी कोई ज़मीन नहीं है. लेकिन परिवार का कहना है कि गांव में भोला पासवान का स्मारक बनाने के लिए तीन डेसीमिल जमीन सरकार को दे दी.
विरंची बताते है, "डी एम साहब से कहा कि आपके चचा का स्मारक बनेगा, तो हमने ज़मीन दे दी. क्या करते?"
विरंची के पोते-पोतियां बगल के ही भोला पासवान प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते है. विरंची के बेटे बसंत पासवान गुस्से से कहते है, "21 सितंबर को भोला बाबू की जयंती रहती है तो प्रशासन को हमारी याद आती है."
पूर्णिया में दूसरे चरण में चुनाव होने है. भारतीय राजनीति पर नज़र रखने वाली संस्था एडीआर की रिपोर्ट कहती है कि 2004 से अब तक बिहार के सांसद और विधायकों की औसत संपत्ति 2.46 करोड़ है. इसमें पुरुषों की बात करें तो ये 2.57 करोड़ और महिला सांसद/ विधायकों की 1.61 करोड़ है.
नेताओं के इस धनबल और बाहुबल के बीच सादगी, सरलता और ईमानदारी से जीने वाले फनी गोपाल सेनगुप्ता और भोला पासवान शास्त्री जैसे नेता भी थे.
देवनाथ सेन कहते है, "लोग बहुत सम्मान करते हैं. कोई ये तो नहीं कहता चोर का बेटा जा रहा है. अब नई पीढ़ी आ गई जो मेरे पिता को नहीं जानती. जो उनके जैसे मूल्य रखने वालों को भूल रही है."
देखने में ये बात बहुत सामान्य-सी लगती है लेकिन दुकानदार देवनाथ सेन कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं. वो चार बार सांसद रहे फनी गोपाल सेन गुप्ता के बेटे हैं.
फनी गोपाल सेनगुप्ता 1952 से 1967 के बीच पूर्णिया लोकसभा क्षेत्र के लिए हुए चार आम चुनावों में जीत कर सांसद बने थे.
देवनाथ सेन बताते है, "पिताजी से जब कभी संपत्ति के बारे में बात की तो वो कहते थे - तुम खुद कमा के बना लेना, बहुत आनंद आएगा. यही सोचना कि तुम्हारे बाप ने तुम्हारे लिए कुछ नहीं किया. तब से ये बात दिलोदिमाग में बैठ गई कि ईमानदारी की रोटी खाएगें. "
फनी गोपाल सेनगुप्ता का खानदानी पेशा कविराज यानी वैद्द का था. ललित मोहन सेन गुप्ता का ये परिवार बांग्लादेश से 1890 में पूर्णिया आकर बस गया था.
ललित मोहन के तीन बेटे थे. सबसे बड़ा बेटा शिक्षक, फिर फनी गोपाल सेनगुप्ता और सबसे छोटा बेटा कविराज यानी वैद्द. चूंकि सबसे छोटे बेटे की मृत्यु कम उम्र में ही हो गई, इसलिए खानदानी पेशे को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं था.
पूर्णिया जिले की स्थापना के 250 साल पूरे होने पर प्रशासन द्वारा छापी पत्रिका 'वल्लरी' के मुताबिक़ फनी गोपाल सेनगुप्ता का जन्म 1905 में पूर्णिया शहर में हुआ.
मुख्य तौर पर ड्राइ फ्रूट की दुकान चला रहे देववाथ बताते है, "1929 में वो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में जुड़े जिसके बाद वो 1929, 1932, 1940, 1944 में जेल गए. 1933 में उनकी शादी हो गई लेकिन वो ज्यादातर जेल में रहते थे. तो मेरी नानी कहती थी कि मैने अपनी बेटी के गले में कलसी बांध कर पानी में डुबो दिया है."
पूर्णिया और भागलपुर से अपनी पढाई करने वाले फनी गोपाल सेनगुप्ता को बांग्ला, हिन्दी, उर्दु, अंग्रेजी भाषा पर अधिकार था.
परिवार के पास फनी गोपाल के जो कागज़ात हैं उनमें अंग्रेजी दैनिक अखबार 'द सर्चलाइट' का भी एक पत्र है. इस पत्र में संपादक सुभाष चन्द्र सरकार ने फनी गोपाल सेनगुप्ता को टैगोर की कविताओं के हिन्दी अनुवाद के लिए धन्यवाद दिया है.
पत्र में लिखा है कि ये कविताएं संपादक प्रदीप के संपादक को भेज रहे है.
परिवार के पास मौजूद दस्तावेज़ों में फनी गोपाल सेनगुप्ता की डायरी है जिसमें वो रोजाना की गतिविधियां बेहद महीन अक्षरों में अंग्रेजी में लिखते थे. इसके अलावा पार्लियामेंट लिखे नोटपैड के पन्ने है जिसमें उनका संसद सत्र के दौरान हुआ खर्च लिखा है.
देवनाथ सेन बताते है, "उस वक्त जब सत्र चलता था तब 40 रूपये रोज़ाना मिलता था. सासंद लॉज में रहते थे और दिल्ली आना-जाना भी अपने पैसे पर करना पड़ता था."
"पिताजी थर्ड क्लास में सफर करते थे और यहां क्षेत्र में साइकिल से ही घूमते थे. क्योंकि पैसे थे नहीं."
खुद देवनाथ सेन की पढ़ाई आर्थिक तंगी के चलते छूट गई.
देनवाथ सेन बताते है, "हम 3 भाई और 2 बहन थे. पिताजी सांसद थे लेकिन परिवार में बहुत आर्थिक तंगी थी. मैने पूर्णिया कालेज में दाखिला लिया था लेकिन बीए नहीं कर पाया और 1971 में मैंने ये दुकान खोल ली. हालांकि बहन शतोदल और मृदुला सेन में से छोटी बहन मृदुला को पोस्ट ग्रेजुएशन कराया."
देवनाथ कहते है, "हमारे पिता ने जीवन बहुत ईमानदारी से जिया. वो चार बार सांसद रहे लेकिन हम लोगों को कभी दिल्ली नहीं ले कर गए. बस एक बार पूरा परिवार दिल्ली घूमने गया था."
मुख्यमंत्री के पोते कर रहे हैं मज़दूरी
पूर्णिया शहर में स्थित इस दुकान से कुछ दूर ही मजदूरों की मंडी लगती है. काम के इंतजार में खड़े मजदूरों में बसंत और कपिल पासवान भी है.
ये दोनों ही बिहार के तीन बार और पहले दलित मुख्यमंत्री रहे भोला पासवान शास्त्री के पोते है.
रोजाना पूर्णिया के केनगर प्रखंड के बैरगाछी से ये लोग काम की तलाश में 14 किलोमीटर का फासला तय करके आते हैं. मजदूरी करते हैं और लौट जाते हैं. भोला पासवान की कोई संतान नहीं थी, उनकी जिंदगी के सहारे उनके भाइयों के बच्चे ही रहे.
वो कहते थे, "मेरी और मेरे बच्चों की पूरी जिंदगी मजदूरी करते हुए कट गई. बहुत मुश्किल से राशन कार्ड मिला है. लेकिन ये भी एक ही है जबकि बेटे तीन है. हमको तीन राशन कार्ड दिलवा दीजिए. जिंदगी थोड़ी आसान हो जाएगी."
परिवार के पास अपनी कोई ज़मीन नहीं है. लेकिन परिवार का कहना है कि गांव में भोला पासवान का स्मारक बनाने के लिए तीन डेसीमिल जमीन सरकार को दे दी.
विरंची बताते है, "डी एम साहब से कहा कि आपके चचा का स्मारक बनेगा, तो हमने ज़मीन दे दी. क्या करते?"
विरंची के पोते-पोतियां बगल के ही भोला पासवान प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते है. विरंची के बेटे बसंत पासवान गुस्से से कहते है, "21 सितंबर को भोला बाबू की जयंती रहती है तो प्रशासन को हमारी याद आती है."
पूर्णिया में दूसरे चरण में चुनाव होने है. भारतीय राजनीति पर नज़र रखने वाली संस्था एडीआर की रिपोर्ट कहती है कि 2004 से अब तक बिहार के सांसद और विधायकों की औसत संपत्ति 2.46 करोड़ है. इसमें पुरुषों की बात करें तो ये 2.57 करोड़ और महिला सांसद/ विधायकों की 1.61 करोड़ है.
नेताओं के इस धनबल और बाहुबल के बीच सादगी, सरलता और ईमानदारी से जीने वाले फनी गोपाल सेनगुप्ता और भोला पासवान शास्त्री जैसे नेता भी थे.
देवनाथ सेन कहते है, "लोग बहुत सम्मान करते हैं. कोई ये तो नहीं कहता चोर का बेटा जा रहा है. अब नई पीढ़ी आ गई जो मेरे पिता को नहीं जानती. जो उनके जैसे मूल्य रखने वालों को भूल रही है."
Monday, April 8, 2019
पाकिस्तानी एफ़ 16 विमान को लेकर दावे-प्रतिदावे में जो अब तक मालूम है
अमरीकी रक्षा मंत्रालय के मुख्यालय पेंटागन को ऐसी किसी भी जांच की कोई जानकारी नहीं है जो यह जानने के लिए की गई थी कि पाकिस्तान ने 27 फ़रवरी को अपना एक एफ-16 लड़ाकू विमान खोया है या नहीं. भारतीय अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है.
गुरुवार को अमरीका की ही एक प्रतिष्ठित पत्रिका 'फॉरेन पॉलिसी' ने एक लेख में यह लिखा था कि "अमरीकी रक्षा विभाग के अधिकारियों ने हाल ही में पाकिस्तान के एफ़-16 लड़ाकू विमानों की गिनती की है और उनकी संख्या पूरी है."
जिसके जवाब में भारतीय वायुसेना ने समाचार एजेंसी पीटीआई से दोहराया था कि 27 फ़रवरी को हुई डॉगफ़ाइट के दौरान उसने पाकिस्तान के एफ़-16 लड़ाकू विमान को गिराया था.
उधर पत्रिका 'फॉरेन पॉलिसी' के मुताबिक़, "दो वरिष्ठ अमरीकी अधिकारियों ने उन्हें यह बताया कि उन्होंने हाल ही में एफ़-16 विमानों का निरीक्षण किया है और वे सभी सुरक्षित पाए गए."
भारत के अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स ने यह दावा किया है कि उसने अमरीकी रक्षा विभाग के प्रवक्ता से बात की है जिसमें उन्होंने कहा है कि "अमरीकी रक्षा विभाग को ऐसी किसी भी जांच के बारे में नहीं पता है."
यानी पेंटागन का यह बयान 'फॉरेन पॉलिसी' की रिपोर्ट के बिल्कुल विपरीत है. हालांकि 'फॉरेन पॉलिसी' की रिपोर्ट में अधिकारियों की पहचान नहीं बताई गई थी.
हिंदुस्तान टाइम्स ने जब विभाग से यह सवाल पूछा कि वो इस रिपोर्ट को ख़ारिज करेंगे या इसकी पुष्टि तो उन्होंने खुद को इस रिपोर्ट से दूर रखते हुए कहा कि "हम अन्य देशों की सरकार के साथ अमरीकी सरकार के रक्षा सौदे की बारीकियों पर सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कह सकते."
उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स से यह भी कहा कि, "पाकिस्तान पर उनकी सरकार की नीति के तहत यह बताना ज़रूरी है कि अमरीकी सरकार ने पाकिस्तान को दी जाने वाली रक्षा सहायता को जनवरी 2018 से रोक रखा है."
पत्रिका 'फॉरेन पॉलिसी' की रिपोर्ट आने के बाद पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ़ गफ़ूर ने कहा था, "भारत के हमले और उसके असर के दावे भी झूठे हैं और यह समय आ गया है कि भारत को अपने ख़ुद के नुक़सान, जिसमें पाकिस्तान के अपने अन्य विमानों के मार गिराने की सच्चाई भी शामिल है, के बारे में बताना चाहिए."
वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भी ट्वीट कर कहा, "सच की हमेशा जीत होती है और यही श्रेष्ठ नीति है. युद्ध का उन्माद फैला कर चुनाव जीतने का बीजेपी का प्रयास और पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमान को मार गिराने का झूठा दांव उल्टा पड़ गया है. अमरीकी अधिकारियों ने भी पुष्टि कर दी है कि पाकिस्तानी बेड़े से कोई एफ-16 गायब नहीं है."
पेंटागन की ओर से बयान आने से भारतीय वायु सेना के उस बयान को बल मिल रहा है जिसमें उसने पाकिस्तान के एक एफ़-16 विमान को गिराने का दावा किया है.
भारत की तीनों सेनाओं ने 28 फरवरी को संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेस की थी. इस दौरान सेना ने पाकिस्तानी वायुसेना के भारतीय सीमा में एफ़-16 विमान से हमला करने के सबूत पेश किए थे.
वायुसेना के एयर वाइस मार्शल आरजीके कपूर ने कहा था कि पाकिस्तानी वायु सेना ने भारतीय सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए एम्राम मिसाइल का इस्तेमाल किया गया, इसे केवल पाकिस्तान में मौजूद एफ़-16 विमान ही दाग सकता है.
एयर वाइस मार्शल आरजीके कपूर ने कहा था, "पाकिस्तानी वायुसेना ने 27 फ़रवरी को हमला करने की कोशिश की. भारतीय वायुसेना के रडार ने पाकिस्तानी वायुसेना के एफ़-16, जेएफ़-17 और मीराज lll/V विमानों को अपनी ओर आते देखा. भारतीय वायुसेना के सुखोई 30-एमकेआई, मीराज-2000 और मिग-21 बाइसन विमानों ने उनको इंटरसेप्ट किया. भारतीय वायुसेना ने भारत के किसी भी टारगेट पर हमला करने के पाकिस्तानी वायुसेना के सभी प्रयासों को नाकाम कर दिया. इस हवाई झड़प में भारतीय वायुसेना के एक मिग-21 बाइसन विमान ने पाकिस्तान के एक एफ़-16 विमान को नौशेरा सेक्टर में मार गिराया."
भारतीय वायु सेना ने कहा, "भारतीय सेना ने इस बात की पुष्टि की है कि उस दिन दो अलग-अलग जगहों पर दो पायलटों ने इजेक्ट किया था. दोनों जगह एक दूसरे से क़रीब 8-10 किलोमीटर के फ़ासले पर हैं. एक भारतीय वायुसेना का मिग-21 बाइसन विमान था और दूसरा पाकिस्तानी वायुसेना का एक विमान था. हमें जो इलेक्ट्रॉनिक जानकारियां मिली हैं वो ये संकेत देते हैं कि पाकिस्तान का विमान एफ़-16 था."
फॉरेन पॉलिसी की ख़बर में कहा गया था कि "संभव है कि मिग 21 उड़ाने वाले अभिनंदन ने पाकिस्तानी एफ़-16 विमान को निशाने पर लिया हो, फ़ॉयर भी किया हो और मान लिया हो कि निशाना सही लगा. लेकिन पाकिस्तान में अमरीकी अधिकारियों की जांच नई दिल्ली के दावों पर संदेह पैदा करती है. और लगता है कि भारतीय अधिकारियों ने उस दिन क्या हुआ, इस बारे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गुमराह किया."
पत्रिका के मुताबिक अमरीकी रक्षा अधिकारी ने बताया कि घटना के बाद पाकिस्तान ने एफ़-16 विमानों की गिनती के लिए अमरीका को आमंत्रित किया था.
उनके मुताबिक एफ़-16 लड़ाकू विमानों की बिक्री के दौरान हुए समझौता के तहत अमरीका को अधिकार है कि उपकरणों की गिनती और सुरक्षा के लिए वो समय समय पर जांच करे.
गुरुवार को अमरीका की ही एक प्रतिष्ठित पत्रिका 'फॉरेन पॉलिसी' ने एक लेख में यह लिखा था कि "अमरीकी रक्षा विभाग के अधिकारियों ने हाल ही में पाकिस्तान के एफ़-16 लड़ाकू विमानों की गिनती की है और उनकी संख्या पूरी है."
जिसके जवाब में भारतीय वायुसेना ने समाचार एजेंसी पीटीआई से दोहराया था कि 27 फ़रवरी को हुई डॉगफ़ाइट के दौरान उसने पाकिस्तान के एफ़-16 लड़ाकू विमान को गिराया था.
उधर पत्रिका 'फॉरेन पॉलिसी' के मुताबिक़, "दो वरिष्ठ अमरीकी अधिकारियों ने उन्हें यह बताया कि उन्होंने हाल ही में एफ़-16 विमानों का निरीक्षण किया है और वे सभी सुरक्षित पाए गए."
भारत के अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स ने यह दावा किया है कि उसने अमरीकी रक्षा विभाग के प्रवक्ता से बात की है जिसमें उन्होंने कहा है कि "अमरीकी रक्षा विभाग को ऐसी किसी भी जांच के बारे में नहीं पता है."
यानी पेंटागन का यह बयान 'फॉरेन पॉलिसी' की रिपोर्ट के बिल्कुल विपरीत है. हालांकि 'फॉरेन पॉलिसी' की रिपोर्ट में अधिकारियों की पहचान नहीं बताई गई थी.
हिंदुस्तान टाइम्स ने जब विभाग से यह सवाल पूछा कि वो इस रिपोर्ट को ख़ारिज करेंगे या इसकी पुष्टि तो उन्होंने खुद को इस रिपोर्ट से दूर रखते हुए कहा कि "हम अन्य देशों की सरकार के साथ अमरीकी सरकार के रक्षा सौदे की बारीकियों पर सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कह सकते."
उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स से यह भी कहा कि, "पाकिस्तान पर उनकी सरकार की नीति के तहत यह बताना ज़रूरी है कि अमरीकी सरकार ने पाकिस्तान को दी जाने वाली रक्षा सहायता को जनवरी 2018 से रोक रखा है."
पत्रिका 'फॉरेन पॉलिसी' की रिपोर्ट आने के बाद पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ़ गफ़ूर ने कहा था, "भारत के हमले और उसके असर के दावे भी झूठे हैं और यह समय आ गया है कि भारत को अपने ख़ुद के नुक़सान, जिसमें पाकिस्तान के अपने अन्य विमानों के मार गिराने की सच्चाई भी शामिल है, के बारे में बताना चाहिए."
वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भी ट्वीट कर कहा, "सच की हमेशा जीत होती है और यही श्रेष्ठ नीति है. युद्ध का उन्माद फैला कर चुनाव जीतने का बीजेपी का प्रयास और पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमान को मार गिराने का झूठा दांव उल्टा पड़ गया है. अमरीकी अधिकारियों ने भी पुष्टि कर दी है कि पाकिस्तानी बेड़े से कोई एफ-16 गायब नहीं है."
पेंटागन की ओर से बयान आने से भारतीय वायु सेना के उस बयान को बल मिल रहा है जिसमें उसने पाकिस्तान के एक एफ़-16 विमान को गिराने का दावा किया है.
भारत की तीनों सेनाओं ने 28 फरवरी को संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेस की थी. इस दौरान सेना ने पाकिस्तानी वायुसेना के भारतीय सीमा में एफ़-16 विमान से हमला करने के सबूत पेश किए थे.
वायुसेना के एयर वाइस मार्शल आरजीके कपूर ने कहा था कि पाकिस्तानी वायु सेना ने भारतीय सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए एम्राम मिसाइल का इस्तेमाल किया गया, इसे केवल पाकिस्तान में मौजूद एफ़-16 विमान ही दाग सकता है.
एयर वाइस मार्शल आरजीके कपूर ने कहा था, "पाकिस्तानी वायुसेना ने 27 फ़रवरी को हमला करने की कोशिश की. भारतीय वायुसेना के रडार ने पाकिस्तानी वायुसेना के एफ़-16, जेएफ़-17 और मीराज lll/V विमानों को अपनी ओर आते देखा. भारतीय वायुसेना के सुखोई 30-एमकेआई, मीराज-2000 और मिग-21 बाइसन विमानों ने उनको इंटरसेप्ट किया. भारतीय वायुसेना ने भारत के किसी भी टारगेट पर हमला करने के पाकिस्तानी वायुसेना के सभी प्रयासों को नाकाम कर दिया. इस हवाई झड़प में भारतीय वायुसेना के एक मिग-21 बाइसन विमान ने पाकिस्तान के एक एफ़-16 विमान को नौशेरा सेक्टर में मार गिराया."
भारतीय वायु सेना ने कहा, "भारतीय सेना ने इस बात की पुष्टि की है कि उस दिन दो अलग-अलग जगहों पर दो पायलटों ने इजेक्ट किया था. दोनों जगह एक दूसरे से क़रीब 8-10 किलोमीटर के फ़ासले पर हैं. एक भारतीय वायुसेना का मिग-21 बाइसन विमान था और दूसरा पाकिस्तानी वायुसेना का एक विमान था. हमें जो इलेक्ट्रॉनिक जानकारियां मिली हैं वो ये संकेत देते हैं कि पाकिस्तान का विमान एफ़-16 था."
फॉरेन पॉलिसी की ख़बर में कहा गया था कि "संभव है कि मिग 21 उड़ाने वाले अभिनंदन ने पाकिस्तानी एफ़-16 विमान को निशाने पर लिया हो, फ़ॉयर भी किया हो और मान लिया हो कि निशाना सही लगा. लेकिन पाकिस्तान में अमरीकी अधिकारियों की जांच नई दिल्ली के दावों पर संदेह पैदा करती है. और लगता है कि भारतीय अधिकारियों ने उस दिन क्या हुआ, इस बारे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गुमराह किया."
पत्रिका के मुताबिक अमरीकी रक्षा अधिकारी ने बताया कि घटना के बाद पाकिस्तान ने एफ़-16 विमानों की गिनती के लिए अमरीका को आमंत्रित किया था.
उनके मुताबिक एफ़-16 लड़ाकू विमानों की बिक्री के दौरान हुए समझौता के तहत अमरीका को अधिकार है कि उपकरणों की गिनती और सुरक्षा के लिए वो समय समय पर जांच करे.
Thursday, April 4, 2019
असहमति रखने वालों को कभी राष्ट्र विरोधी नहीं कहा: आडवाणी
पूर्व उप प्रधानमंत्री और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने आख़िरकार चुनाव के पहले चरण से ठीक एक हफ्ते पहले अपनी चुप्पी तोड़ी.
पार्टी की स्थापना दिवस से दो दिन पहले चुप्पी तोड़ने के लिए उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में कोई भाषण तो नहीं दिया, लेकिन अपनी बात कहने के लिए ब्लॉग का सहारा ज़रूर लिया.
पाँच सौ से अधिक शब्दों के अंग्रेज़ी में लिखे इस ब्लॉग की हेडलाइन है 'नेशन फर्स्ट, पार्टी नेक्स्ट, सेल्फ़ लास्ट' (यानी पहले देश, फिर पार्टी, आख़िर में ख़ुद).
आडवाणी की परंपरागत संसदीय सीट गांधीनगर से बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के उम्मीदवार बनने के बाद आडवाणी ने सार्वजनिक तौर पर पहली बार कोई टिप्पणी की है.
ये ब्लॉग पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित है और छह अप्रैल को पार्टी की स्थापना दिवस से दो दिन पहले लिखा गया है.
ये बीजेपी में हम सभी के लिए एक महत्वपूर्ण मौका है, अपने पीछे देखने का, आगे देखने का और अपने भीतर झांकने का. बीजेपी के संस्थापकों में से एक के रूप में, मैं मानता हूँ कि ये मेरा कर्तव्य है कि मैं भारत के लोगों के साथ अपने प्रतिबिंबों को साझा करूँ, और विशेषकर मेरी पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं के साथ. इन दोनों के सम्मान और स्नेह का मैं ऋृणी हूँ.
अपने विचारों को साझा करने से पहले, मैं गांधीनगर के लोगों के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने 1991 के बाद से मुझे छह बार लोकसभा के लिए चुना. उनके प्यार और समर्थन ने मुझे हमेशा अभिभूत किया है.
मातृभूमि की सेवा करना तब से मेरा जुनून और मिशन रहा है, जब 14 साल की उम्र में मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा था. मेरा राजनीतिक जीवन लगभग सात दशकों से मेरी पार्टी के साथ अविभाज्य रूप से जुड़ा रहा है- पहले भारतीय जनसंघ के साथ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के साथ. मैं दोनों ही पार्टियों के संस्थापक सदस्यों में से था. पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी और कई अन्य महान, निस्वार्थ और प्रेरणादायक नेताओं के साथ मिलकर काम करना मेरा दुर्लभ सौभाग्य रहा है.
मेरे जीवन का मार्गदर्शक सिद्धांत 'पहले देश, फिर पार्टी और आख़िर में खुद' रहा है. और हालात कैसे भी रहे हों, मैंने इन सिद्धांतों का पालन करने की कोशिश की है और आगे भी करता रहूँगा.
भारतीय लोकतंत्र का सार अभिव्यक्ति का सम्मान और इसकी विभिन्नता है. अपनी स्थापना के बाद से ही भाजपा ने कभी उन्हें कभी 'शत्रु' नहीं माना जो राजनीतिक रूप से हमारे विचारों से असहमत हो, बल्कि हमने उन्हें अपना सलाहकार माना है. इसी तरह, भारतीय राष्ट्रवाद की हमारी अवधारणा में, हमने कभी भी उन्हें, 'राष्ट्र विरोधी' नहीं कहा, जो राजनीतिक रूप से हमसे असहमत थे.
पार्टी निजी और राजनीतिक स्तर पर प्रत्येक नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर प्रतिबद्ध है.
देश में और पार्टी के भीतर लोकतंत्र और लोकतांत्रिक परंपराओं की रक्षा भारत के लिए गर्व की बात रही है. इसलिए, भाजपा हमेशा मीडिया समेत हमारे सभी लोकतांत्रिक संस्थानों की आज़ादी, अखंडता, निष्पक्षता और मज़बूती की मांग करने में सबसे आगे रही है. भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति के लिए चुनावी सुधार, राजनीतिक और चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता पर विशेष ध्यान देना पार्टी के लिए प्राथमिकता रहा है.
संक्षेप में, सत्य, राष्ट्र निष्ठा और लोकतंत्र ने मेरी पार्टी के संघर्ष के विकास को निर्देशित किया. इन सभी मूल्यों से मिलकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सुराज (गुड गवर्नेंस) बनता है, जिन पर मेरी पार्टी हमेशा से बनी रही. आपातकाल के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक संघर्ष भी इन्हीं मूल्यों को बनाए रखने के लिए था.
ये मेरी ईमानदार इच्छा है कि हम सभी को सामूहिक रूप से भारत की लोकतांत्रिक शिक्षा को मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए. सच है कि चुनाव, लोकतंत्र का त्योहार है. लेकिन वे भारतीय लोकतंत्र के सभी हितधारकों - राजनीतिक दलों, मास मीडिया, चुनाव प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों और सबसे बढ़कर मतदाताओं के लिए ईमानदारी से आत्मनिरीक्षण का एक अवसर है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकृष्ण आडवाणी के ब्लॉग को ट्वीट कर कहा है कि उन्होंने अपने ब्लॉग में बीजेपी का सार बताया है. ख़ासकर उनका मार्गदर्शन मंत्र 'पहले देश, फिर पार्टी और अंत में ख़ुद'. मोदी ने ट्वीट किया, "भाजपा कार्यकर्ता होने पर गर्व है और इस बात का भी गर्व है कि एलके आडवाणी जैसी महान शख्सियतों ने इसे मजबूती दी है."
पार्टी की स्थापना दिवस से दो दिन पहले चुप्पी तोड़ने के लिए उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में कोई भाषण तो नहीं दिया, लेकिन अपनी बात कहने के लिए ब्लॉग का सहारा ज़रूर लिया.
पाँच सौ से अधिक शब्दों के अंग्रेज़ी में लिखे इस ब्लॉग की हेडलाइन है 'नेशन फर्स्ट, पार्टी नेक्स्ट, सेल्फ़ लास्ट' (यानी पहले देश, फिर पार्टी, आख़िर में ख़ुद).
आडवाणी की परंपरागत संसदीय सीट गांधीनगर से बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के उम्मीदवार बनने के बाद आडवाणी ने सार्वजनिक तौर पर पहली बार कोई टिप्पणी की है.
ये ब्लॉग पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित है और छह अप्रैल को पार्टी की स्थापना दिवस से दो दिन पहले लिखा गया है.
ये बीजेपी में हम सभी के लिए एक महत्वपूर्ण मौका है, अपने पीछे देखने का, आगे देखने का और अपने भीतर झांकने का. बीजेपी के संस्थापकों में से एक के रूप में, मैं मानता हूँ कि ये मेरा कर्तव्य है कि मैं भारत के लोगों के साथ अपने प्रतिबिंबों को साझा करूँ, और विशेषकर मेरी पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं के साथ. इन दोनों के सम्मान और स्नेह का मैं ऋृणी हूँ.
अपने विचारों को साझा करने से पहले, मैं गांधीनगर के लोगों के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने 1991 के बाद से मुझे छह बार लोकसभा के लिए चुना. उनके प्यार और समर्थन ने मुझे हमेशा अभिभूत किया है.
मातृभूमि की सेवा करना तब से मेरा जुनून और मिशन रहा है, जब 14 साल की उम्र में मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा था. मेरा राजनीतिक जीवन लगभग सात दशकों से मेरी पार्टी के साथ अविभाज्य रूप से जुड़ा रहा है- पहले भारतीय जनसंघ के साथ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के साथ. मैं दोनों ही पार्टियों के संस्थापक सदस्यों में से था. पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी और कई अन्य महान, निस्वार्थ और प्रेरणादायक नेताओं के साथ मिलकर काम करना मेरा दुर्लभ सौभाग्य रहा है.
मेरे जीवन का मार्गदर्शक सिद्धांत 'पहले देश, फिर पार्टी और आख़िर में खुद' रहा है. और हालात कैसे भी रहे हों, मैंने इन सिद्धांतों का पालन करने की कोशिश की है और आगे भी करता रहूँगा.
भारतीय लोकतंत्र का सार अभिव्यक्ति का सम्मान और इसकी विभिन्नता है. अपनी स्थापना के बाद से ही भाजपा ने कभी उन्हें कभी 'शत्रु' नहीं माना जो राजनीतिक रूप से हमारे विचारों से असहमत हो, बल्कि हमने उन्हें अपना सलाहकार माना है. इसी तरह, भारतीय राष्ट्रवाद की हमारी अवधारणा में, हमने कभी भी उन्हें, 'राष्ट्र विरोधी' नहीं कहा, जो राजनीतिक रूप से हमसे असहमत थे.
पार्टी निजी और राजनीतिक स्तर पर प्रत्येक नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर प्रतिबद्ध है.
देश में और पार्टी के भीतर लोकतंत्र और लोकतांत्रिक परंपराओं की रक्षा भारत के लिए गर्व की बात रही है. इसलिए, भाजपा हमेशा मीडिया समेत हमारे सभी लोकतांत्रिक संस्थानों की आज़ादी, अखंडता, निष्पक्षता और मज़बूती की मांग करने में सबसे आगे रही है. भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति के लिए चुनावी सुधार, राजनीतिक और चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता पर विशेष ध्यान देना पार्टी के लिए प्राथमिकता रहा है.
संक्षेप में, सत्य, राष्ट्र निष्ठा और लोकतंत्र ने मेरी पार्टी के संघर्ष के विकास को निर्देशित किया. इन सभी मूल्यों से मिलकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सुराज (गुड गवर्नेंस) बनता है, जिन पर मेरी पार्टी हमेशा से बनी रही. आपातकाल के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक संघर्ष भी इन्हीं मूल्यों को बनाए रखने के लिए था.
ये मेरी ईमानदार इच्छा है कि हम सभी को सामूहिक रूप से भारत की लोकतांत्रिक शिक्षा को मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए. सच है कि चुनाव, लोकतंत्र का त्योहार है. लेकिन वे भारतीय लोकतंत्र के सभी हितधारकों - राजनीतिक दलों, मास मीडिया, चुनाव प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों और सबसे बढ़कर मतदाताओं के लिए ईमानदारी से आत्मनिरीक्षण का एक अवसर है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकृष्ण आडवाणी के ब्लॉग को ट्वीट कर कहा है कि उन्होंने अपने ब्लॉग में बीजेपी का सार बताया है. ख़ासकर उनका मार्गदर्शन मंत्र 'पहले देश, फिर पार्टी और अंत में ख़ुद'. मोदी ने ट्वीट किया, "भाजपा कार्यकर्ता होने पर गर्व है और इस बात का भी गर्व है कि एलके आडवाणी जैसी महान शख्सियतों ने इसे मजबूती दी है."
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