Friday, March 29, 2019

英国脱欧继续 前首相卡梅伦在忙什么

本来英国应该在3月29日脱离欧盟,但好/坏事多磨,又有新的议案要投票表决,脱欧继续延期,前方道路上还蜷伏着各种未知数。回想这三年的历程,人们想起了一个几乎被遗忘的名字:英国前首相卡梅伦。

他三年前发起脱欧公投,打开潘多拉魔盒。但他现在在哪里?

英国脱欧之路过去三年来波诡云谲,程序繁复,曲折逶迤。在各种争论和谩骂间,卡梅伦淡出了公众视线。

不过,沉寂多时的前首相近日再度亮相,接受独立电视台(ITV)采访,直言对发起公投不后悔,并声援自己的继任特雷莎·梅首相。

他说:“我支持首相。她寻求跟欧盟达成伙伴关系协议,我认为做得对,很正确。”

卡梅伦认为,无协议脱欧不是件好事。

至于此前一直很少接受采访,卡梅伦的解释是,梅首相现在的工作已经够艰难了,如果她的前任在这种时刻发表评论只会给她增压添乱。

"我要说的是,我支持她,祝她好运。"

对卡梅伦的政治生涯来说,可谓成也脱欧,败也脱欧。他2016年发起脱欧公投,结果出来后为履行诺言辞去首相职务,随即逐渐淡出公众视野。

他在这三年里写了本自传,估计会透露不少他在唐宁街10号里最后那段日子悲喜交加的细节。

卡梅伦辞职以后,大部分时间用来写回忆录。据报道他专门为此花2.5万英镑买了个牧羊人的小木屋作为书房,据说还曾一度陷入"写作瓶颈"。

英国《观察家报》说,把曾经发生的一切用白纸黑字写下来,等于强迫他重新经历一边"痛苦的决策过程",个中滋味旁人不容易体会。

据他的朋友对《星期日泰晤士报》透露,卡梅伦原计划2018年秋季出版回忆录,但为了避免书里涉及脱欧问题的评论和观点影响英国与欧盟的谈判,决定把出版日期推迟到2019年9月。

现在可能除了作者、编辑和少数看过书稿的人知道卡梅伦在自传里是怎么写当年内阁同事在脱欧这件事上的表现。

据知情者对媒体透露,卡梅伦对脱欧派主力迈克尔·戈夫当年"背信弃义"在公投前不久倒戈加入脱欧阵营痛恨之极,至今难以释怀,而对同样力主脱欧的鲍里斯·约翰逊责难却没有那么深切,虽然约翰逊对卡梅伦下台也出了力。

实际上,《星期日泰晤士报》说,卡梅伦现在其实在设法跟自己的伊顿公校校友约翰逊修复私交,改善关系。去年秋天,卡梅伦邀约翰逊一起打网球,然后共进晚餐。

除了写回忆录,卡梅伦也在做一些其他事,包括负责全国青年服务基金会(National Citizen Service)的扩大。他在任时主导设立了这个为青少年提供技能培训的项目并担任项目赞助人委员会主席。

这个基金会组织15-17岁的青少年参加户外活动和旅行,策划青少年社会活动项目并为此筹款。卡梅伦的工作是设法吸引更多各党派要人和业界专家参与并支持这个项目,扩大其服务覆盖面。

另外,他也像其他前任政界要人一样做公共演讲,为他安排这类演讲的机构,WSB(Washington Speakers Bureau)的嘉宾名册上还有英国前财相奥斯本。据悉奥斯本曾经在二个月内挣了超过50万英镑的演讲费,但卡梅伦的收费比奥斯本低。

WSB网站上有卡梅伦的个人介绍,形容他是"21世纪初期最具全球影响力的人物之一",他可以传授经验,分享在国际局势极度动荡不安的时期担当领袖的体会。

卡梅伦目前同时在若干机构担任董事。不过,他除了写回忆录、做演讲和为NCS推广、筹款,绝大部分时间投入中英基金(UK-China Fund)— 他从2017年起就担任中英基金副主席。

这是个投资基金,主攻方向是中英两国在科技、医疗、能源和制造业的合作。

基金创立前后曾引发利益冲突的质疑。卡梅伦如果要为这个基金向政府部长们游说,政府事先必须得到议会的直接批准。

一切都在风中飘荡。去年深秋季节,曾有传闻说卡梅伦在考虑将来要不要在政府内阁谋个高级别的职位。

据英国小报《太阳报》记者汤姆·邓恩透露,卡梅伦曾对朋友诉苦,说自己在家闲着实在无聊得要命,想着要能在下一届保守党政府里当外相应该很不错。

邓恩从卡梅伦这位朋友嘴里还听说,卡梅伦经常表露出希望在政府里担任要职的愿望,内政外交都可以。邓恩引述这位消息来源说:"他(卡梅伦)才52岁,还是个小伙子呢。"

从社交媒体上对这种风声的反应来看,有些议员对他的这种想法感到愤怒。当然,历史上也不是没有卸任首相若干年后又进入内阁的先例。

不过,卡梅伦的议会大厦通行证2019年3月上旬作废了,因为他没有及时去续期。

《每日邮报》报道说,英国有400多为前任政界领袖持有进出议会的通行证,卡梅伦是其中之一。他可以凭这张通行证在议会大厦院内享受优惠服务,比如价格打折的餐饮。

但是,报道说,因为一个"令人尴尬的行政手续之故",卡梅伦从这个名单上被剔除了。当然,再办一张通行证也不是完全不可能。

Monday, March 25, 2019

न्यूयॉर्क की आसमान छूती इमारतों के बीच बग़ावत का प्रतीक वो पत्थर

बग़ावत की एक चिंगारी ही शोला बन जाती है. और अगर कोई बग़ावत कामयाब न भी हुई, तो वो तारीख़ के पन्नों में सुनहरे हर्फ़ों में दर्ज हो जाती है.

ऐसी ही एक चिंगारी छुपी हुई है, बुलंद इमारतों के शहर न्यूयॉर्क में. यूं तो दुनिया न्यूयॉर्क को ऊंची-ऊंची इमारतों के लिए जानती है. आपको शहर का मुआयना करना है, तो सिर उठा कर चलना होगा.

पर, बग़ावत की एक चिंगारी का दीदार करने के लिए आप को अर्श नहीं, फ़र्श की तरफ़ निहारना होगा.

न्यूयॉर्क के ग्रीनविच विलेज में सड़कें बेतरतीब हैं. ख़ास तौर से यहां के 110 सेवेंथ एवेन्यू साउथ में कई सिम्त से आती सड़कें एक जगह मिलती हैं.

पहली नज़र में ये न्यूयॉर्क की कोई आम सी जगह मालूम होती है. सड़कों से गुज़रती हुई टैक्सियां देख कर पता नहीं चलता कि यहां कोई ऐतिहासिक स्मारक भी हो सकता है. पास ही स्थित वन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की बुलंद इमारत दिखती है. पास ही स्थित स्टारबक्स की दूसरी तरफ़ विलेज सिगार्स नाम की दुकान है.

इसके सामने लगा है एक तिकोना पत्थर. हो सकता है कि यहां से गुज़रते हुए आपको इसकी मौजूदगी का पता ही न चले. स्याह-सफ़ेद टाइलों से बना ये स्मारक अलग सा तो नहीं दिखता. और फिर इसका कुल दायरा है महज़ दो वर्ग फुट. ऐसे में भला किसकी नज़र इस पर पड़ेगी.

इस पर लिखा है कि, 'हेस परिवार की संपत्ति है, जिसने ख़ुद को कभी भी हुक्मरानों के हवाले नहीं किया.'

ग्रीनविच विलेज सोसाइटी फॉर हिस्टोरिक प्रेज़र्वेशन के एंड्र्यू बर्मन कहते हैं कि ये छोटा सा पत्थर सार्वजनिक हितों के आगे निजी संपत्ति की क़ुर्बानी न देने के संघर्ष का प्रतीक है.

आज से क़रीब एक सदी पहले ग्रीनविच विलेज की आबादी तेज़ी से बढ़ने लगी थी. मैनहट्टन से लगा होने की वजह से इस गांव में जल्द ही सड़कों और दूसरी सुविधाओं का जाल बिछाने की ज़रूरत महसूस हुई.

सरकारी दस्तावेज़ों के मुताबिक़ जहां ये पत्थर लगा है, वो जगह वोरहेस एस्टेट के नाम से लॉट नंबर 55 के तौर पर दर्ज थी.

बीसवीं सदी की शुरुआत में न्यूयॉर्क शहर तेज़ी से तरक़्क़ी कर रहा था. ग्रीनविच गांव के पास बना पेन रेलवे स्टेशन हडसन नदी के नीचे बनी सुरंग से शहर के दूसरे हिस्से को जोड़ता था. इसके ज़रिए बड़ी तादाद में लोग आवाजाही करते थे. इसीलिए सेवेंथ एवेन्यू इलाक़े के बुनियादी ढांचे के विस्तार का फ़ैसला किया गया.

न्यूयॉर्क टाइम्स की अक्टूबर 1913 की रिपोर्ट कहती है कि इस निर्माण कार्य के लिए 253 इमारतों को ढहाने का फ़ैसला किया गया, ताकि नई और चौड़ी सड़क बनाई जा सके.

गिरायी जाने वाली इमारतों में वोरहेस की बिल्डिंग भी शामिल थी. इसके मालिक फ़िलाडेल्फ़िया के डेविड हेस थे.

सार्वजनिक हित के लिए निजी संपत्तियों के अधिग्रहण का क़ानून न्यूयॉर्क ने संविधान संशोधन के ज़रिए बनाया था. अमरीकी संविधान में पांचवें संशोधन के मुताबिक़, सरकार स्कूल, अस्पताल और दूसरे सार्वजनिक निर्माण कार्य के लिए किसी भी नागरिक की संपत्ति को अपने क़ब्ज़े में ले सकती थी.

लेकिन डेविड हेस के परिवार ने अपनी ज़मीन, सरकार को देने से मना कर दिया. मुक़दमा चला और बड़ी अदालत तक गया. आख़िरकार हेस परिवार हार गया और उसे वोरहेस इमारत सरकार के हवाले करनी पड़ी. 1913 में उसे गिरा दिया गया. आज सेवेंथ एवेन्यू के विस्तार वाली सड़क ठीक उसी जगह से गुज़रती है, जहां कभी वोरहेस बिल्डिंग हुआ करती थी.

क़िस्सा इसके साथ ही ख़त्म हो जाना चाहिए था. पर, ऐसा हुआ नहीं.

अगर आप 1916 के न्यूयॉर्क के नक़्शे को बारीक़ी से देखें, तो आप को छोटा सा तिकोना पत्थर नज़र आएगा. ये ग्रीनविच विलेज के लॉट नंबर 55 का बचा-खुचा हिस्सा है. 1916 तक क़ानूनी रूप से ये हेस परिवार की संपत्ति थी.

इस सवाल के कई जवाब मिलते हैं. कोई कहता है कि सरकारी अफ़सरों की ग़लती से ऐसा हुआ. बाद में सरकार ने हेस परिवार से दो वर्ग फुट के इस टुकड़े को दान करने को कहा. पर हेस परिवार इसके लिए भी राज़ी नहीं हुआ, जबकि इतने छोटे से ज़मीन के टुकड़े की कोई क़ीमत नहीं थी. मामला फिर अदालत में गया. इस बार अदालत ने इस ज़मीन को हेस परिवार के पास ही रहने देने का फ़ैसला सुनाया.

हालांकि 29 जुलाई 1922 के द फिलाडेल्फ़िया लेजर के मुताबिक़ न्यूयॉर्क के प्रशासन ने हेस परिवार से इस ज़मीन का संपत्ति कर चुकाने को कहा था. लेकिन डेविड हेस के बेटे फ्रैंक हेस ने कहा कि उन्हें इस ज़मीन के बारे में कुछ पता नहीं.

हालांकि हमें ये मालूम है कि ये तिकोनी टाइल यहां 26 जुलाई 1922 को लगाई गई. न्यूयॉर्क टाइमस के एक लेख के मुताबिक़ इस पर 100 डॉलर का टैक्स बकाया है.

विलेज सिगार नाम की दुकान से हुए समझौते में फ्रैंक हेस इस बात पर राज़ी हुए कि ये तिकोनी जगह एक निजी संपत्ति है, जिसे उन्होंने विलेज सिगार को एक हज़ार डॉलर में बेचा. आज ये रक़म 17 हज़ार 500 डॉलर बैठती है.

1922 से लेकर अब तक ये छोटी सी जगह जस की तस रखी गई है.

कुछ लोग ये दावा करते हैं कि ख़ुद डेविड हेस ने मालिकाना हक़ का मुक़दमा लड़ा था. जबकि ये सच नहीं है.

एंड्रयू बर्मन कहते हैं कि महज़ 2 वर्ग फुट की ये जगह वो चिंगारी है, जिसने न्यूयॉर्क के ताक़तवर प्रशासन से लोहा लिया था.

Monday, March 18, 2019

राही मासूम रज़ा: 'मेरा नाम मुसलमानों जैसा है'

बात ग़ालिबन 1976 की है. राही मासूम रज़ा लखनऊ आए हुए थे. उन्हें 'मिली' फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखक का पुरस्कार मिला था.

वो किसी होटल में न ठहर कर अपने भांजे नदीम हसनैन के घर पर रुके हुए थे.

इमर्जेंसी के दौरान कुछ पत्रकारों और लेखकों को छोड़कर सारे लोग उस समय की सरकार की जी हज़ूरी में लगे हुए थे.

'फ़िल्म राइटर्स असोसिएशन' ने भी इंदिरा गांधी और इमर्जेंसी के समर्थन में एक प्रस्ताव पास करवाने की कोशिश की. राही मासूम रज़ा अकेले लेखक थे जिन्होंने इसका विरोध किया.

नदीम हसनैन बताते हैं, "लेखकों की कोशिश थी कि इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पास किया जाए. कई लोग जो उससे सहमत नहीं थे या तो ख़ामोश रहे या ग़ैर-हाज़िर हो गए लेकिन राही वाहिद शख़्स थे, जिन्होंने उसे मानने से साफ़ इनकार कर दिया."

"उनके कई दोस्तों ने उन्हें सलाह दी कि आप 'वॉक आउट' कर जाइए लेकिन उन्होंने ज़ोर दिया कि उनके विरोध को बाक़ायदा दर्ज किया जाए.

जब वो घर लौटे तो रात भर उनकी इस अंदेशे में कटी कि कब पुलिस आ कर उन्हें गिरफ़्तार कर लेगी.' लेकिन ऐसा हुआ नहीं. पर ये बताता है कि वो किस हद तक व्यवस्था के ख़िलाफ़ बुलंद आवाज़ में बोल सकते थे."

राही मासूम रज़ा का जन्म एक अगस्त, 1927 को ग़ाज़ीपुर में हुआ था. 11 साल की उम्र में उन्हें टीबी हो गई. उस ज़माने में टीबी का कोई इलाज नहीं था.

बीमारी के बीच उन्होंने घर में रखी सारी किताबें पढ़ डालीं. उनका दिल बहलाने और उन्हें कहानी सुनाने के लिए कल्लू काका को मुलाज़िम रखा गया.

राही ने ख़ुद माना है कि अगर कल्लू काका नहीं होते तो वो कई कोई कहानी नहीं लिख पाते.

नदीम हसनैन बताते हैं, "हम लोग गर्मियों की छुट्टियों में अपने ननिहाल जाया करते थे ग़ाज़ीपुर. मेरी राही की सबसे पहली यादें वहीं की हैं. वहाँ मैंने राही को घर में तो कुर्ता पायजामा पहने देखा. वो हल्का सा लंगड़ा कर चलते थे क्योंकि उनके पैर में पोलियो था. वो बहुत नफ़ीस उर्दू बोलते थे और बहुत अच्छी भोजपुरी भी बोलते थे."

"जब वो बाहर जाते थे तो हमेशा शेरवानी और अलीगढ़ी पाजामा पहनते थे. उनकी शेरवानी कभी रंगीन नहीं होती थी. हमेशा वो क्रीम कलर की शेरवानी पहना करते थे. चश्मा हमेशा वो काला पहनते थे, हाँलाकि उनकी आँखों में कोई समस्या नहीं थी. मैंने उन्हें मोहर्रम में मजलिस पढ़ते हुए भी देखा है, जो बहुत कम लोगों ने देखा होगा."

"वो कभी तख़्त या चटाई पर नहीं बैठते थे, बल्कि खड़े हो कर तक़रीर के अंदाज़ में मजलिस पढ़ा करते थे. वैसे उनको धर्म से कोई ख़ास लगाव नहीं था."

जब राही बीमारी से ठीक हुए तो उनको पढ़ाने के लिए मौलवी मुनव्वर को रखा गया. लेकिन उनसे उनकी कभी नहीं बनी.

राही मासूम रज़ा के सबसे करीबी दोस्त कुंवरपाल सिंह उनकी जीवनी में लिखते हैं, "मौलवी साहब राही को कभी पसंद नहीं थे क्योंकि उन्हें पढ़ाई से ज़्यादा पिटाई करने में मज़ा आता था. राही ने एक बार मुझे बताया था, हम पिटाई से बचने के लिए अपना जेबख़र्च मौलवी मुनव्वर को दे देते थे."

"इसलिए हम लोगों का बचपन बड़ी ग़रीबी में गुज़रा और शायद यही वजह है कि ख़रीद-फ़रोख़्त की कला न मुझमें आई और न ही भाई साहब मूनिस रज़ा में. हम दोनों झट से पैसा ख़र्च करने के आदी हैं. शायद इसलिए कि मौलवी मुनव्वर का डर अभी तक नहीं निकला है. हम डरते हैं कि पैसा ख़र्च नहीं किया गया तो पैसा मौलवी साहब झपट लेंगें."

अपनी जवानी के दिनों में राही पढ़ने के साथ-साथ कम्यूनिस्ट पार्टी का काम भी किया करते थे.

एक बार कम्यूनिस्ट पार्टी ने तय किया कि गाज़ीपुर नगरपालिका के अध्यक्ष पद के लिए कामरेड पब्बर राम को खड़ा किया जाए. पब्बर राम एक भूमिहीन मज़दूर थे.

राही और उनके बड़े भाई मूनिस रज़ा दोनों कॉमरेड पब्बर का चुनाव प्रचार करने लगे.

उसी समय कांग्रेस ने राही के पिता बशीर हसन आबिदी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया. अब दोनों भाइयों के सामने एक बड़ा धर्मसंकट पैदा हो गया.

दोनों ने अपने पिता को समझाया कि वो चुनाव में न खड़े हों.

बशीर साहब ने कहा, "मैं 1930 से कांग्रेसी हूँ. पार्टी की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर पाऊंगा."

राही ने जवाब दिया, "हमारी भी मजबूरी है कि हम आपके ख़िलाफ़ पब्बर राम को चुनाव लड़वाएंगे."

राही घर से सामान उठा कर पार्टी ऑफ़िस चले गए. जब चुनाव के नतीजे आए तो सब ये जान कर स्तब्ध रह गए कि एक भूमिहीन मज़दूर ने ज़िले के सबसे मशहूर वकील को भारी बहुमत से हरा दिया था.

राही मासूम रज़ा के बारे में मशहूर था कि वो एक साथ कई स्क्रिप्ट्स पर काम करते थे. शुरू-शुरू में वो नाम बदल कर भी उपन्यास लिखा करते थे.

नदीम हसनैन बताते हैं, "एक बार मैंने देखा कि उनके सामने दो-तीन क्लिप बोर्ड रखे हुए हैं. वो थोड़ी देर एक बोर्ड पर लिखते हैं, फिर दूसरे बोर्ड के सामने चले जाते हैं. पूछने पर पता चला कि वो एक तो रूमानी दुनिया का उपन्यास लिख रहे थे."

"दूसरा एक जासूसी दुनिया का नॉवेल लिख रहे हैं और साथ ही साथ वो एक अख़बार के लिए एक लेख भी लिख रहे हैं. यह उस समय का दौर था जब उनका काफ़ी वक्त इलाहाबाद और ग़ाज़ीपुर के बीच ग़ुज़रता था. उस वक्त इलाहाबाद से निकहत पब्लिकेशन एक 'रूमानी दुनिया' और एक 'जासूसी दुनिया' हर माह निकाला करते थे."

"जासूसी दुनिया इब्ने सफ़ी लिखा करते थे जो बहुत लोकप्रिय हो गई थी. राही शाहिद अख़्तर के नाम से हर महीने एक नॉवेल लिखा करते थे. बहुत से नॉवेल उन्होंने आफ़ाक़ हैदर के नाम से भी लिखे. जब इब्ने सफ़ी पाकिस्तान चले गए और उन्हें एक गंभीर मानसिक बीमारी हो गई. तब ये समस्या आई कि कौन नॉवेल लिखे?"

"तब राही साहब से पूछा गया कि क्या आप जासूसी नॉवेल भी लिख सकते हैं, क्योंकि किसी महीने नाग़ा नहीं होना चाहिए. तब उन्होंने आफ़ताब नासिरी को नाम से जासूसी नॉवेल भी लिखे. उनकी ये जो 'मल्टी-टास्किंग' थी, वो मेरे लिए बहुत हैरत-अंगेज़ बात थी."

Friday, March 15, 2019

सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम पर चुनाव आयोग को दिया नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने विपक्षी दलों की याचिका पर सुनवाई करते हुए शुक्रवार को चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है.

विपक्ष के 21 दलों ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की है. इसमें कोर्ट से चुनाव आयोग को ये निर्देश देने की अपील की गई है कि आम चुनाव में 50 फ़ीसद ईवीएम के नतीजों को वीवीपैट से मिलान करें और उसी के बाद नतीजों का एलान किया जाए.

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधारी रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पीठ ने चुनाव आयोग से कहा है कि वो 25 मार्च तक अपना जवाब दाखिल करें. इसी दिन मामले की अगली सुनवाई होगी.

विपक्षी दल ईवीएम को लेकर कई बार सवाल उठा चुके हैं. हालांकि, चुनाव आयोग ने हर बार आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि ईवीएम पूरी तरह सुरक्षित हैं.

कांग्रेस के बड़े नेता और गांधी परिवार के नजदीकी समझे जाने वाले टॉम वडक्कन ने बीजेपी का दामन थाम लिया है. इसे कांग्रेस पार्टी के लिए एक बड़ा झटका समझा जा रहा है.

वडक्कन 20 साल से अधिक से कांग्रेस में थे. उन्होंने कांग्रेस पार्टी में परिवारवाद का आरोप लगाया है.

बीजेपी से जुड़ने के बाद उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके कार्यों और नज़रिये से प्रभावित हैं.

वडक्कन ने कहा, "कांग्रेस पार्टी को मैंने अपने जीवन के ऊर्जा से भरपूर 20 साल दिए हैं, लेकिन परिवारवाद यहां चरम पर है, जो एक स्वाभिमानी कार्यकर्ता स्वीकार नहीं कर पाएगा."

उन्होंने बीजेपी जॉइन करने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी के अधिकारियों को धन्यवाद दिया.

वडक्कन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और केरल में पार्टी के प्रवक्ता के साथ ही कई महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं.

उन्नाव लोकसभा से भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने पार्टी को धमकी भरी चिट्ठी लिखकर कहा है कि अगर उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया गया तो पार्टी को हार का सामना करना पड़ेगा.

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय को लिखी चिट्ठी में साक्षी महाराज ने क्षेत्र के जातीय समीकरण का ज़िक्र करते हुए कहा है, "क्षेत्र में मुझे छोड़कर ओबीसी का कोई प्रतिनिधि नहीं है. अगर उन्नाव से मेरे संबंध में पार्टी कोई अन्य निर्णय लेती है तो इससे मेरे प्रदेश और देश के करोड़ों कार्यकर्ताओं के आहत होने की पूरी संभावना है, जिसका परिणाम भी सुखद नहीं रहेगा."

उन्होंने लिखा है कि पिछले चुनाव में वो तीन लाख पंद्रह हज़ार वोटों से जीते थे और अगर इस बार भी वहीं से मौका मिला तो महागठबंधन के प्रत्याशी अरुण कुमार शुक्ला और कांग्रेस प्रत्याशी अन्नू टंडन की जमानत जब्त कराएंगे.

साक्षी महाराज ने इस बार पांच लाख से अधिक वोटों से जीत दर्ज कराने का दावा किया है.

तृणमूल कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों के लिए अपने 42 उम्मीदवारों की सूची जारी की दी है. इसमें 17 महिलाओं को टिकट दिया गया है.

तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आज उम्मीदवारों की घोषणा की.

इस सूची के मुताबिक दार्जिलिंग से गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के अमर सिंह राई चुनाव लड़ रहे हैं. दोनों दलों ने यहां से साझा उम्मीदवार खड़ा किया है.

इसके अलावा सूची में विजय चंद्र बर्मन, परेश चंद्र अधिकारी, दशर​थ तिरके, कन्हैया लाल अग्रवाल और अर्पित घोष जैसे नाम शामिल हैं.

तृणमूल कांग्रेस ने इस बार लगभग 41 प्रतिशत महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है. इसमें मुनमुन सेन और शताब्दी रॉय जैसी अभिनेत्रियों के नाम भी हैं. कुछ ही दिन पहले ओडिशा में बीजू जनता दल के प्रमुख नवीन पटनायक ने पार्टी में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी.

इसके अलावा टीएमसी असम में छह, ​बिहार में दो, झारखंड में तीन, अंडमान में एक और ओडिशा में दो सीटों पर चुनाव लड़ेगी.

Monday, March 11, 2019

मोदी कैसे हमेशा राहुल से सौ क़दम आगे रहते हैं: ब्लॉग

गली के नुक्कड़ों, चाय की दुकानों, पान की गुमटियों और रोडवेज़ बस अड्डों पर सिर्फ़ कुछ देर खड़े रह कर ही आप समझ जाते हैं कि बदलाव होने वाला है. और कुछ समय बाद ऐसे ऐसे ताक़तवर सत्ताधीश ताश के पत्तों की तरह बिखरे नज़र आते हैं जिनका हारना कल्पना से परे होता है.

जिन लोगों ने 1976 में होश संभाल लिया था वो मदहोश कर देने वाली बदलाव की गंध को भूले नहीं होंगे. देश को 19 महीने तक इमरजेंसी के अंधेरे में धकेलने वाली धाकड़ प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जनता ने उन चुनाव में सत्ता से बेदख़ल कर दिया था. लेकिन 1976 में जिन्होंने होश नहीं संभाला था, उन्हें 1987-88 की हवाओं का स्वाद ज़रूर याद होगा.

सिर्फ़ 42 साल की उम्र में राजीव गाँधी 400 से ज़्यादा सीटें जीतकर प्रधानमंत्री बने थे. पर 1989 में वो ऐसे फिसले कि काँग्रेस पार्टी आज तक अपनी टांगों पर खड़ी नहीं हो पाई है.

जो लोग 1989 में भी बच्चे थे या पैदा नहीं हुए थे उन्हें भी याद होगा कि सत्ता परिवर्तन की वही पुरानी गंध देश की हवाओं में 2013 से ही घुलनी शुरू हो गई थी. मोदी के अलावा दूर-दूर तक किसी को कोई और नज़र ही नहीं आ रहा था. कांग्रेस अपने पेंदे का एक छेद बंद करती तो दूसरे छेद से पानी रिसने लगता.

पर आज इतने साल बाद विपक्ष में रहते हुए भी कांग्रेस अपने रिसते छेदों को बंद करती हुई ही क्यों नज़र आ रही है? जब पूरा विपक्ष मानता है कि नरेंद्र मोदी और उनकी राजनीति के कारण उसके लिए अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है, तो राफ़ेल के मुद्दे पर राहुल गांधी इतने अकेले क्यों दिखते हैं? कभी ममता बनर्जी कह देती हैं कि 'दाल में कुछ काला तो है'.

कभी सीताराम येचुरी संयुक्त संसदीय समिति से जांच करवाने की मांग कर देते हैं. पर तभी अखिलेश यादव कह देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद अब जांच की ज़रूरत नहीं है.

राहुल गांधी अकेले क्यों चिल्ला रहे हैं?
ऐसा क्यों लगता है कि इस राजनीतिक अरण्य में घूमते हुए अकेले राहुल गाँधी ज़ोर से चिल्ला रहे हैं - चौकीदार चोर है!! मगर उनकी आवाज़ में कोई आवाज़ नहीं मिलाता और उनकी अपनी अनुगूंज ही उन तक लौट आती है. ख़ाली.

ये ठीक है कि उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की मायावती और समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव अपने मतविरोध भुलाकर साथ आ गए हैं. कभी-कभार अख़बार के पन्नों में तृणमूल काँग्रेस की ममता बनर्जी, तेलुगू देशम के चंद्रबाबू नायडू, शरद यादव, लालू प्रसाद यादव के पुत्र और विपक्ष के दूसरे नेता सिरों के ऊपर एक दूसरे के हाथ पकड़े नज़र आ जाते हैं. लेकिन कहाँ हैं छात्रों-नौजवानों की वो टोलियाँ, वो जन संगठन, वो छोटी-छोटी ट्रेड यूनियनें जिन्होंने 1987-88 में नारों से राजीव गांधी के ख़िलाफ़ भूचाल खड़ा कर दिया था.

हवाओं में बारूदी गंध है
टेलीविज़न देखें तो लगता है कि एक बार फिर 2013 के दृश्य रिपीट होने लगे हैं. हर स्क्रीन पर या तो नरेंद्र मोदी लाइव होते हैं या उनके सिपहसालार अमित शाह - हर रोज़. कोई टीवी चैनल कभी-कभार राहुल गांधी को दिखा भी देता है तो पूरा कार्यक्रम 'धीमी गति के समाचार' में बदल जाता है. प्रियंका गाँधी लॉन्च होने के तुरंत बाद इतनी अदृश्य सी हो गई हैं कि लोग भूलने लगे होंगे कि कांग्रेस की संकटमोचक बनाकर उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का कार्यभार सौंपा गया है.

कुल मिलाकर मार्च 2019 की हवाओं में परिवर्तन की बजाय बारूद की गाढ़ी गंध फैला दी गई है. अभी चंद महीने पहले राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भरपूर कोशिशों के बावजूद बीजेपी का पत्ता साफ़ हो गया था. तब ऐसा लग रहा था कि मोदी का ढलान शुरू हो गया है और उनके पास वोटर को दिखाने के लिए अब कोई नया सपना नहीं बचा.

जब देश ने सोचा, 'अब हीरो की एंट्री होगी'
लगभग हताशा में संघ परिवार के रणनीतिकारों ने राम मंदिर के मुद्दे पर हिंदुओं को एकजुट करना चाहा मगर उन्हें इस मुद्दे पर जनता की उबासियां साफ़-साफ़ सुनाई देने लगीं. सुप्रीम कोर्ट का रुख़ भी मदद नहीं कर रहा था. अमित शाह के हाथ-पांव फूलने लगे और घबराहट में वो सुप्रीम कोर्ट तक को घुड़की देने लगे.

विश्व हिंदू परिषद ने भी अपने साधु-साध्वियों को झाड़-पोंछ कर आंदोलन के लिए तैयार कर लिया. लेकर गलियों-गुमटियों में ये सवाल पूछा जाने लगा था कि बीजेपी को चुनाव से पहले ही राम मंदिर की याद क्यों आती है? आख़िरकार वो दांव भी संघ परिवार को वापिस लेना पड़ा.

नरेंद्र मोदी, अमित शाह और नागपुर के संघ मुख्यालय में अधिकारियों को समझ में आ गया कि देश का 'नैरेटिव' बदले बिना परिवर्तन की गंध को फैलने से नहीं रोका जा सकता. इसके बाद जो कुछ हुआ उसमें वो तमाम एलीमेंट मौजूद थे जो दर्शक को पूरे तीन घंटे तक दम साधकर अपनी सींट पर बैठे रहने को मजबूर कर देते हैं.

पुलवामा में भारतीय सुरक्षा बलों पर फ़िदायीन हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था. जो मोदी "पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब" देने का वादा करके सत्ता में आए थे, वो ऐसे मौक़े पर ख़ामोश कैसे रह सकते थे? पूरा देश दम साधे बैठा था कि परदे पर अब हीरो की एंट्री होगी और विलेन को भागने की जगह नहीं मिलेगी.

हीरो तालियां लूट ले गया!
हीरो की एंट्री हुई. विलेन को उसने एक तगड़ा घूंसा मारा और तालियां लूट ले गया. आश्यर्य से मुंह खोले दर्शक ख़ुशी से झूम उठे. पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट और सीटियों की आवाज़ों से गूँज उठा. हॉल के एक कोने से आवाज़ आई - और मार इसे, और मार. दूसरे कोने से कोई उत्साही पिटते हुए विलेन पर चिल्लाया - देख, आ गया तेरा बाप!!

पिक्चर में ज़बरदस्त मोड़ आ चुका था. ज़्यादातर टेलीविज़न एंकर मोदी के चीयरलीडर्स में बदल गए. पहले टीवी ने कहा कि भारतीय वायुसेना के हमले में बालाकोट में 300 से 400 आतंकवादी मार डाले गए. सरकार, सेना और वायुसेना ने इस बारे में कुछ नहीं कहा. फिर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने गिनती बता दी कि बालाकोट में ढाई सौ आतंकवादी मारे गए.

उन्होंने बाद में ये भी कह दिया कि सबूत माँगने के लिए राहुल गांधी को शर्म आनी चाहिए. नोटबंदी, जीएसटी, बेरोज़गारों की बढ़ती फ़ौज, किसानों की बदहाली, संस्थाओं का भगवाकरण और राफ़ेल ख़रीद में घोटाले के आरोप - सोशल मीडिया पर फूट पड़े राष्ट्रवाद के वलवले ने फ़िलहाल सबको 'न्यूट्रलाइज़' कर दिया है.